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Friday, December 26, 2008

क्या कह के गया था शायर वो सयाना

इब्ने-मरियम हुआ करे कोई,
मेरे दर्द की दवा करे कोई
इब्ने-मरियम यानी मरियम का बेटा- ईसा मसीह को संबोधित करने वाले गालिब उर्दू के कबीर कहे जा सकते है जिन्होंने दैरो -हरम को नही बख्शा और आजीवन एक गैर-मजहबी इन्सान के तौर पर जाने गए । 'इमां मुझे रोके है , तो खेंचे है मुझे कुफ्र काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे' के जरिये मजहबी कट्टरता की मुखालफत करने वाले ग़ालिब की कलम की इज्ज़त ना उनके ज़माने में कभी हुई और वर्तमान में भी सरकारी उदासीनता का आलम यह है की उनके मरने के बाद भी इस अजीमुशान शायर के मज़ार के इन्तेजामत देखने वाले आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अफसरान को ने इसकी सुध नही ली है।

गालिब का जन्म आगरा में 27 दिसंबर 1869 को हुआ था। इसी के ध्यान में रखकर मिर्जा गालिब एकेडमी द्वारा हर साल 27 दिसंबर को समारोह आयोजित किए जाते हैं। कूचा बल्लीमारान में ग़ालिब की मजार है. दिवसों पर बयानबाजी करने वाले इस मुल्क में उनकी जन्मदिन की सालगिरह पर उनकी मजार पर कुछ खास कार्यक्रम आयोजित नही किए गए . यद्यपि गालिब के नाम पर न जाने कितनी सड़कों के नाम रखे गए, फिल्में, सीरियल व डाक्यूमेंट्री बनी होंगी। कितने लोगों ने उनके अदब पर शोध प्रबंध लिखे होंगे. उन्ही के अल्फाजों में कहे तो ' मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों न ग़रके दरिया न कभी जनाजा उठता, न कहीं मजार होता '.

उर्दू अदब में गालिब का मुकाम हिन्दी के प्रेमचंद से किसी तरह कमतर नही है..जिस प्रकार लोगो ने देवकीनंदन खत्री की चंद्रकांता संतति पड़ने के लिए हिन्दी सीखी उसी तरह ग़ालिब की शीरी मगर मानीखेज गजलो, नज्मों ने अवाम में उर्दू सीखने का जज्बा पैदा किया. ज़िन्दगी के हर पहलू पर पर लिखी गई ग़ालिब की शायरी में फल्सफियाना अंदाज़ तो है ही, पारंपरिक ग़ज़ल की रवायत हुस्न-ओ-इश्क को भी उन्होंने बड़ी शिद्दत से अपनी शायरी में पेश किया है। ग़ालिब की शायरी की बिना उर्दू का कोई भी मुशायरा तो अधूरा है ही, हिन्दुस्तानी फिल्मों के गानों को भी ग़ालिब की शायरी की दरकार है.