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Sunday, December 21, 2008

न दर्शकों की डिमांड, न मीडिया की सप्लाई


आईपी कॉलेज में 20 दिसम्बर 2008 को 10th Meet The Media, वार्षिक समारोह के अवसर पर "लाइट, कैमरा, एक्शन- सेंस और सेंसेशन " विषय पर आयोजित सेमिनार में विनोद दुआ (टीवी पत्रकार , NDTVइंडिया), कविता चौधरी (निर्माता-निर्देशक )लिलेट दूबे (फिल्म अभिनेत्री), विनोद कापरी (टीवी पत्रकार , इंडिया टीवी ) , प्रह्लाद काक्कर (ऐड फ़िल्म निर्माता ), परंजय गुहा ठाकुरता (स्तंभकार और मीडिया समीक्षक ), राजीव मसंद (फ़िल्म समीक्षक ) ने विचार प्रस्तुत किए।



परंजय गुहा का मानना था की सेंस और सेंसेशन के बीच एक बारीक रेखा होती है जिसमें फर्क करना बेहद जरुरी होता है और यह फर्क विषय के प्रस्तुतीकरण के साथ उसकी अंतर्वस्तु से भी जुरा है। वहीं कविता का कहना था की sensation की परिभाषा सापेक्ष होती है...सेंस में जहाँ नैतिक जिम्मेदारी का अहसास होता है, सेंसेशन में उतेजित करने का उद्देश्य होता है.लित्तेत दुबे का कहना था की जिस तरह से मुंबई पर आतंकी हमले को २४ घंटे दिखाया जा रहा था...वो सिर्फ़ भय के वातावरण को निर्मित कर रहा था। दूरदर्शन के कार्यक्रमों में कम से कम जवाबदेही तो बनी रहती है ....भले उनकी गुणवत्ता कैसे भी हो . उन पर लोकसभा में बहस की जा सकती है.



विनोद दुआ ने विमर्श को गति देते हुए इंडिया टीवी के बहने भूत-प्रेत, महाप्रलय जैसी अन्धविश्वास से भरी कोवेरेजों पर सवाल उठाया तो विनोद कापरी ने बताया की एक बार स्टार न्यूज़ ने मौलाना द्वारा फतवा बेचे जाने पर ६ माह तक स्टिंग ओपरेशन किया और भरे जोश-खरोश में उसे चैनल पर एयर किया तो उसके जवाब में देश का नंबर १ चैनल 'नागिन का बदला ' चला रहा था...टीआरपी रेटिंग सामने आई तो उनके ६ महीने के मशक्कत को आशानुरूप टीआरपी नही मिली यानी दर्शको ने 'नागिन के बदले ' को हाथो हाथ लिया। टीआरपी के खेल का खुलासा यह है की देश के लगभग ५००० टीआरपी बॉक्स पुरे इंडिया के दर्शको की परतिक्रिया को बताने का दावा करते है तो पूर्वोत्तर राज्यों और बिहार में एक भी टीआरपी बॉक्स नही है.



विनोद दुआ ने कहा की हिन्दी की मनोहर कहानिया जैसी पत्रिकाओं का चंनेलिया संस्करण हमारे सामने मजूद है....इंडिया टीवी जैसे चैनलों को अपना ब्राडकास्टिंग लाइसेंस को समाचार चैनल के बजाय मनोरंजन चैनल में तब्दील करवा लेना चाहिए क्योंकि न्यूज़ के नाम पर वाहियात चीजे परोसना सरासर ग़लत है। यह लो कोस्ट मीडिया रिपोर्ट हैं . मन्दिर में बार पर सभी को आपति होती है...और बार में मन्दिर भी नही जंचता.



मीडियाकर्मियों के जेहन में एक सवाल जो हमेशा हावी रहता है...की उन्हें अपने विवेक और संचार बोध के बजे मैनेजमेंट को की प्रोफिट-मेकिंग पॉलिसी को तुष्ट करना होगा...इसलिए चाहकर भी वे कुछ नही कर सकते, के जवाब में प्रहलाद काकर ने कहा की यह पत्रकारों के अपने एथिक्स पर भी निर्भर है...अगर कों उन्हें आत्मघात करने को कहे तो वो नही करेंगे। ...इसलिए सच को प्रसारित करने की गुंजाइश हमेशा बची रहती हैं.



कितनी अजीब बात है मीडिया सेंसेशन दर्शकों के नाम गैर -जरुरी कार्यक्रमों की आपूर्ति करता है और दर्शकों से उम्मीद की जाती है की वो सेंस दिखाएं....पर क्या कभी किसी चैनल ने दर्शकों के नकारात्मक फीडबैक को प्रसारित किया है...रेडियो पर भी हमेशा श्रोताओं द्वारा चैनल के लिए बांधे तारीफों के पुल या फरमाइशी गाने ही सुनाये जाते हैं...लब्बोलुआब यह की ना तो मीडिया ख़ुद से अच्छे कार्यक्रम बनाने की शुरुआत नही करेगा जब लोग टीवी देखना बंद नही करेंगे या.. सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश जारी नही हो जाते....तब तक कोई मीडिया संगठन सेल्फ सेंसरशिप करता है तो उसकी मेहरबानी hee होगी.

Wednesday, May 28, 2008

NCERT की अभिव्यक्ति का माध्यम

एक अच्छी किताब पढ़ने की संतुष्टि को किस रस या भाव के मातहत रखा जाये ....आचार्य शुक्ल ने तो नहीं बताया, पर श्रध्दा और भक्ति के फर्क की बिनाह पर कम से कम गुरुओं को श्रध्दा और पुस्तकों को भक्ति ( श्रध्दा + प्रेम = भक्ति ) का पात्र तो माना ही जा सकता है।

मनोहर श्याम जोशी की किताब "पटकथा लेखन- एक परिचय" के बाद नसरीन कबीर सिने जगत की मशहूर हस्ती जावेद अख्तर से स्क्रिप्ट प्ले और गीत लेखन पर बातचीत कमाल की है.

NCERT ने भी "abhivykti aur madhaym" pustak prakashit की है । इस kitab में jansanchar madhyamon से लेकर फिल्म-naatak के लिए भी vidhagat लेखन के tareekon से avgat karaya गया है। ये किताब वेबसाइट पर भी मौजूद है.