Sunday, March 29, 2009

छोटे -छोटे शहरों से....हम तो झोला उठा के चले

कुछ दिन पहले 'मुझे चाँद चाहिए' सुरेन्द्र वर्मा का नायिका प्रधान प्रख्यात हिंदी उपन्यास पड़ते हुए दो हिंदी फिल्में 'फैशन' और 'मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूँ' अनायास याद आ गयी....एक मीडिया कर्मी के लिए तो फिल्में टेक्स्ट होती हैं...पर एक साहित्य के अध्येता के लिए भी फिल्में कितने कारगर तरीके से जीनियोलोगी बनाती चलती है, को जानना दिलचस्प होता है....नायिका वर्षा वशिष्ठ भी 'मेघना माथुर' और 'मोहिनी' उर्फ़ चुटकी की तरह करियर के लिए महत्वकांशी तो है, पर छोटे शहर की लड़कियों का मुंबई को कर्मक्षेत्र बनाने तक का सफ़र में ग्लैमर - सिनेमा और फैशन के प्रति उसका दृष्टिकोण स्ट्रेटेजिक डिसीजन्स के चलते अलग होता है.

बचपन की सिलबिल से 'यशोदा' के ओल्ड फैशन नाम से छुटकारा पाकर 'वर्षा वशिष्ट' का चुनाव करती है। वशिष्ठ उपनाम चुनने के पीछे का तर्क के ब्राहमण जाति की ऊँची प्रतिष्ठा से जुडा हुआ है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रवेश पाने के लिए घरवालों की मुखालफत करती हुई वर्षा की अगली मंजिल सिनेमा है...जहाँ गाहे-बगाहे वह रंगमंच के सौन्दर्यबोध और लाइव परफोर्मेंस बनाम चलताऊ और कमाऊ के साथ रिटेक की तुलना करती है, पर उसकी समझदारी की दाद देनी पड़ती है कि न तो वह व्यावसायिक फिल्मो से परहेज करती है और न ही यथार्थवादी सिनेमा को नकारती है और साथ ही रंगमंच में भी सक्रिय रहती है. दोनों के बीच शानदार संतुलन कायम करते हुए वह 'शबाना ' और ' नसीर ' की याद दिलाती है. गौरतलब है की तेजस्विनी कोलाह्पुरी (पद्मिनी कोल्हापुरी की छोटी बहन )अभिनीत इस उपन्यास पर रजा बुंदेला ने सीरियल भी बनाया गया था.


उसका गजरौला की मोहिनी की आदर्श माधुरी की भांति कोई आइकन नहीं है और न ही वह चंडीगढ़ की मेघना माथुर की भांति सफलता के लिए समझौतापरस्त है। रंगमंच की बारीकियों और उसके प्रकार्य की आधारभूमि एक अनुशासन से तो परिचित कराती है ही, उसके साथ पोपुलर मीडियम सिनेमा की अपनी शर्तों और फोर्मुलों के साथ 'इमेज' की सीमाओं को भी जगजाहिर करती है. इसी क्रम में मार्शल मक्लुहन के 'रियर व्यू मिरोर ' फेमोमेनन की भी पुष्टि करती है जिसके तहत तकनीकी विकास के क्रम में हर विधा अपनी पूर्ववर्ती विधा की तुलना में कमतर आंकी जाती है, पर एक सच यह भी है की दृश्य कला पर आधारित विधाओं के लिए रंगमंचीय बोध फंडामेंटल की तरह काम करता है. यूँ ही नहीं भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान , पुणे के पाट्यक्रम में रंगमंच को जोड़ा गया है. आज राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सिनेमा में पदार्पण कर चुके रंगकर्मियों की लम्बी फेहरिस्त गिनाई जा सकती है.


इससे पहले शोबा डे के अंग्रेजी उपन्यास स्टारी नाइट्स का हिंदी रूपांतर 'सितारों की रातें ' भी पड़ा. आशारानी (देविका रानी की प्रॉक्सी) के तौर पर दक्षिण भारतीय अभिनेत्रियों का हिंदी सिनेमा में काम करने के चलन पर रौशनी डाली है. निर्देशकों से लेकर काम दिलवाने वाले एजेंटों की कार्य प्रणाली को करीने से पेश करती हुई इस कृति में में अभिनेत्रियों के प्रति 'शो पीस ' की भांति काम लिए जाने के भी ब्यौरे दर्ज हैं. दक्षिण भारतीय फिल्मों के काम करने के तरीकों और स्टूडियो कल्चर को भी काफी हद तक संबोधित करने की कोशिश कि गयी है.

Tuesday, March 17, 2009

टीवी की बेटियाँ - मुनाफे की रणनीति का नया फार्मूला

सबकी लाडली बेबो (स्टार प्लस) , मेरे घर आई एक नन्ही परी (कलर्स), दोनों ही धारावाहिक ऐसे परिवारों को दिखाते हैं जिनमे कई पीदियों से कोई लड़की पैदा नहीं हुई। आमतौर पर यह देखा गया है की एक बेटी होने के बाद दूसरी बेटी की चाहत नहीं होती....पर बेटों की चाहत बरक़रार रहती है....बेटा पाने की आस में कन्या भ्रूण की हत्या तो होती ही है, फॅमिली प्लानिंग के साइड इफेक्टस भी लड़कियों के हिस्से में ही आये। जिन्दा रही तो घर-बाहर दोनों ही मोर्चों पर गैर-बराबरी का सलूक आम है। चीन में जनसंख्या वृद्धि दर सिफर करने के लिए बनाये गए नियमों के चलते एक संतान के रूप में भी माता पिता बेटे की ख्वाहिश पाले हुए हैं.....हालाँकि बेटे के प्रति प्यार का मतलब हमेशा ही कन्या के प्रति बेरुखी का रूप नहीं होता. ऐसे भी कई परिवार है जो दोनों ही लिंगो की संताने चाहते हैं...पर आज का मौजूं यह है कि क्या कन्या के जन्म को प्रोत्साहन देने के सरकारी गैर सरकारी , सामाजिक सांस्कृतिक मंच उसे केवल प्रकृति में मानव जाति के यौन अनुपात के संतुलन के लिए बढावा दे रहे है, या 'लड़किया कम होगी तो दुल्हन कहाँ से लाओगे ' मार्का जनहित में जारी विज्ञापन की भांति के बहन, बेटी, बहु , पत्नी के पारिवारिक किरदारों की जरुरत पूरी करने के तौर पर देखी जा रही है....या फिर बेटो की अधिकता से होने वाली एकरूपता में परिवार में विविधता लाने के लिए उसकी उपस्थिति होनी चाहिए .....एक मानुषी के रूप में उसकी जरुरत कब महसूस होगी? कब उसे मानवी के नाते जीने का अधिकार मिलेगा...इन सवालों के जवाब बाकी है !

'अनाड़ी, 'राजा' फिल्मों सरीखी कई भाइयों की इकलौती बहनों के ऊपर भी कई पहरे लगाये जाते है....उनके जीवन में डू/ डोंट को तय करने में भाइयों की भूमिका बड़ी मजबूत दिखाई देती है....इन सीरियलों की कहानी आगे किस करवट बैठेगी , यह तो बाद में पता चलेगा....पर धारावाहिकों में कन्या को प्रमोट करना भी विशुद कॉमर्शियल एजेंडा है ..उसी सौन्दर्य प्रसाधनों के विज्ञापन की तरह जो महिलाओं के रंग को निखारने के बाद अगला टारगेट कस्टमर पुरुषों को बना रहा है. यही सास - बहु धारावाहिकों से उकता गए दर्शकों को बांधे रखने/ टीआरपी उठाने का नया फार्मूला है.

Monday, March 2, 2009

अछूत(आ) भारत - अलगाए लोगों की दास्तां

इंडिया अनटच्ड स्टोरीज़ ऑफ़ पीपल अपार्ट वृत्तचित्र की स्क्रीनिंग का एक दौर सफ़र (सोशल एक्शन फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च ) गैर-सरकारी संस्था द्वारा भीमराव आंबेडकर कॉलेज , दिल्ली विश्वविद्यालय में २६ फ़रवरी २००९ को आयोजित किया गया...निर्देशक स्टालिन केo ने १०८ मिनट की इस डॉक्युमेंटरी में अस्पृश्यता और जाति व्यवस्था की समस्या को कई कोणों से सामने लाने की कोशिश की है। हिंदी, भोजपुरी, गुजराती, पंजाबी , तमिल , तेलुगु , मलयालम ज़बानों के स्थानीय रंग के साथ अंग्रेजी उप-शीर्षकों के माध्यम से दृष्टि संस्था ने प्रोडक्शन का कार्यभार संभाला है तो नवसृजन संस्था ने इसके प्रदर्शनों की श्रंखला को बखूबी निभाया है।

४ साल के अथक परिश्रम से निर्मित इस फिल्म में भारत के ८ राज्यों और चार धर्मों में जाति प्रथा की भयावह स्थिति को करीब से सेलुलोइड पर उतारा है....५००० साल से चली आ रही वर्ण व्यवस्था के शास्त्र सम्मत होने के दस्तावेजी आख्यान के बाईट्स और उससे दलितों के ऊपर लगाये हुए प्रतिबंधो के समान्तर सिक्वेंस का फ्रिक्शन जबरदस्त बन पड़ा है। शिक्षा से पैदा होने वाली जागरूकता ने भी दलितों के दर्द को कुछ कम नहीं किया है क्योंकि स्कूलों में भी सवर्ण बच्चे अग्रिम पंक्ति में बैठाये जाते हैं और दलित छात्र बेक बेन्चर्स ही बने रहते हैं...उनसे झाडू लगाने को कहा जाता है...यहाँ तक की एक स्कूल में दलित छात्रों को शौचालय साफ़ करने के लिए मजबूर किया जाता रहा है...ताकि वो अपने पुश्तैनी काम से ही बंधे रह सके। इसकी पुष्टि जेएनयू के छात्रावास में होने वाले कमरों के पार्टीशन के इकबालिया बयानों में होती है ...सफदरजंग के दलित शल्य चिकित्सक को भी महत्वपूर्ण केसों का इंचार्ज नहीं बनाया जाता ...वज़ह साफ़ है ... दलित होने के कारण उनकी योग्यता पर शक किया जाता है।


फिल्म में दिखाया गया है की किस तरह से वे सार्वजनिक वाहनों की सवारियों से वंचित है...वो अगडी जाति के गावों में साइकिल पर सवारी नहीं कर सकते, चप्पले पहनकर प्रवेश नहीं कर सकते। एक दलित मिस्त्री जो सवर्णों के मकानों को बनता है...मकान बनाने के बाद उसमें उसका प्रवेश वर्जित हो जाता है । रेल की पटरी के नीचे आकर मरने वालों की लाशों और मृत पशुओं को ठिकाने लगाने वाले लोग हों या सवर्णों स्त्रियों की प्रसूति में मदद करने वाली दलित दाइयां , इनकी भी हालत कोई बेहतर नहीं है। राजपूत जाति के लोग ताल ठोंककर कहते हैं कि नीची जाति के लोग उनके सामने ऊपर बैठने की हिमाकत नहीं कर सकते।


दलितों ने जाति प्रथा के दुष्परिणामों से बचने के लिए धर्मान्तरण का सहारा लिया , पर वहां भी उन्हें चैन नहीं मिलता...इसाई, इसलाम में भी उन्हें दोयम दर्जा दिया जाता रहा है। कैसी विडम्बना है सिख धर्म के स्थापना के समय पंज प्यारों से उनकी जाति नहीं पूछी गयी पर जाट सिख, वाल्मीकि सिख जैसे जाति विभेद बरक़रार हैं...इसलाम में भी जाति का निषेध है...मस्जिद में यह याद रखा जाता है...पर उससे बाहर आते ही लोग जाति भेद को का बर्ताव करने लग जाते हैं...यही हाल नमाज में नमाजियों की पंक्तियों का भी है...इसीलिए शेख-सैयदों की मस्जिदे भी अलग-अलग हो जाती हैं।


दलित और सवर्णों के अंतरजातीय विवाहों की बात तो दूर की कौडी है...खुद दलितों में भी जाति व्यवस्था की हाइरार्की बनी हुई है...अगडे दलित भी अपने से जाति में कमतर दलितों से सामाजिक सम्बन्ध रखने पर सहमत नही हैं.....आरक्षण के पक्ष-विपक्ष में लोगो की राय दिखाकर निर्देशक ने इस सवाल का जवाब दर्शकों पर छोड़ा है। वृत्तचित्र के एक खंड में अखबारों के वैवाहिक विज्ञापन भी जाति-प्रथा की गहराती जड़ों को दिखाते हैं...जिनमें नगरीय भारत विभाजित है। क्लाइमेक्स फ़िल्म का सबसे बेहतरीन हिस्सा है जिसमें निर्देशक ने पत्रकारों के मानिंद केवल अपनी रिपोर्ट पेश नहीं की है ...बल्कि जाति बंधन के प्रतिबन्ध को तोड़ने की एक पहल के जरिये अँधेरे में लौ दिखाई ...इसीलिए 'आपको कैसा लग रहा है ' के टीवी पत्रकारिता की सीमाओं से एक कदम आगे दलित लड़की को सवर्णों के कुएं से पानी भरकर अपना सर गर्व से ऊँचा करते हुए दिखाया है और एक दलित लड़के का सवर्णों के पेयजल को पीना आत्म-सम्मान की तृष्णा के तुष्टि भाव को चित्रित करता है।


चूँकि डॉक्युमेंटरी ऐसे ज्वलंत पर आधारित थी..जिससे किसी न किसी रूप में हर हिन्दुस्तानी का सरोकार बनता है...चाहे वह किसी भी जाति से ताल्लुक रखता हो...इसलिए चर्चा के दौरान गरमा-गर्मी तो हुई ही ....कई लोग भावुक हो कर रो भी दिए....बहरहाल वृतचित्र की खासियत यही थी की इसके कोलाज की भांति विसुअल्स एंड साउंड बाइट्स किसी के दिलो-दिमाग को उद्देलित करने के लिए काफी थे...और दूर तक मन में कई सवालों की अंतहीन कड़ियों को जोड़ते चले जाते हैं.

Sunday, February 22, 2009

परिधि से केन्द्र की ओर : 'स्माइल पिंकी'


मुंबई की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म 'स्लमडाग मिलेनियर' को बेस्ट अडाप्टेड स्क्रीनप्ले, बेस्ट साउड मिक्सिंग, बेस्ट एडिटिंग, बेस्ट सिनेमेटोग्राफी और बेस्ट म्यूजिक श्रेणी के लिए आस्कर पुरस्कार से नवाजा गया। सोने पर सुहागा यह की भारत में बनी 'स्माइल पिंकी' ने सर्वश्रेष्ठ डाक्यूमेंटरी [लघु कथानक ] का आस्कर जीता। जब मैं यह पोस्ट लिख रही हूँ टीवी चैनलों पर लॉस एंजेल्स के कोडक हॉल में ऑस्कर समारोह की कवरेज पेश की जा रही थी...बीच में ऑस्कर की तमाम श्रेणियो के अवार्डों की घोषणा रह -रह कर ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में चल रही थी....यदा कदा याद दिलाया जा रहा था की 'स्माइल पिंकी' की प्रविष्टि ने भी ऑस्कर भारत की झोली में डाला है...अखबारों को तो कल सुबह तक इंतज़ार करना पड़ेगा । उनकी वेबसाइट पर फ्लैश में भारत को मिले ऑस्कर की सूचनाएं रन कर रही हैं। भले ही अमिताभ ऑस्कर को भाव न देते हों ...पर यहाँ पर 'लगान' फिल्म की याद आती है...जिसमें भद्र पुरुषों के ब्रितानी खेल में हिन्दुस्तानी किसान उन्हीं के खेल नियमों पर मात देकर लगान करवा लेते हैं...इस बिन्दु को राष्ट्रवादी नज़रिए से न देखा जाए तो ऑस्कर का अन्तराष्ट्रीय अवार्ड भी पश्चिमी सिनेमा के बरक्स हिन्दुस्तानी सिनेमा के रेकोग्निशन का सवाल बन जाता है...जिसे अपने सिने मापदंड हैं।

इस बीच एक बहुत बड़ा फर्क यह देखने को मिला की 'स्लमडाग मिलेनियर' को उतना हाईलाईट नही किया जा रहा है, जितना की वेटेज 'स्माइल पिंकी' को दी जा रही है। सुर्खिया भी 'जय हो' से ही पटी हुई हैं...और 'स्माइल पिंकी' की सफलता को कही सप्लीमेंट्री रिजल्ट की तरह सुनाया जा रहा है.वज़ह साफ़ है.'स्लमडाग मिलेनियर' ने प्रचार तंत्र पर सब कुछ झोंका है...दूसरा भारत में वृत्तचित्रों का मॉस मार्केट नही हैं...किसी भी राह चलते व्यक्ति से आप फिल्मों की अच्छी -खासी जानकारी पा सकते हैं॥पर वृत्तचित्रों के बारे में पूछे जाने पर बुद्धिजीवी वर्ग के नुमाइंदे भी गर्दन घुमाने लगते है...कॉलेज स्टूडेंट्स तो हाथ खड़े कर देते हैं.

डॉक्युमेंटरी के साथ यह संकट रहा है की यह कम से कम भारत में तो एक जन विधा के तौर पर लोकप्रिय नही है...साहित्य की हालत तो फिर भी कही बेहतर है...प्रकाशक पाठक के साथ मार्केट तो किसी तरह बना हुआ है...मूलतः डॉक्युमेंटरी को पाँच तरह के मकसद के लिए बनाया जाता है...सरकारी संस्थाओं की जरूरतों जैसे स्थापना वर्षगांठ, या किसी अजीमुश्शान शख्सियत की जिंदगी पर, कारपोरेट फिल्म /विज्ञापन शूट के तौर पर, आन्दोलनधर्मिता के साक्ष्य के तौर पर और कुछ डिस्कवरी-नेशनल ज्योग्राफिक ,हिस्ट्री चैनल इत्यादि के प्रोग्राम कंटेंट के तौर पर और ज्ञान दर्शन, अतुल्य भारत के अकादमिक-सांस्कृतिक प्रोमोशनल सामग्री के तौर पर। ज्ञानपीठ ने साहित्यकारों पर वृत्तचित्रों की श्रंखला सीडी जारी की है.

आमतौर पर अन्दोलान्धर्मी डॉक्युमेंटरी प्राइवेट स्क्रीनिंग की जाती है.... और अगर चंद खुशनसीब डॉक्युमेंटरी की पब्लिक स्क्रीनिंग होती भी है तो उसे फिल्म की तुलना में नए औडिएंस नसीब नही होते हैं....उसके औडिएंस उतने ही लोग होते हैं जो डॉक्युमेंटरी फॉर्म को पहचानते हैं या फिर विषय विशेष की डॉक्युमेंटरी की खासियत से वाकिफ होते हैं।दूसरा डॉक्युमेंटरी का काम भी असंगठित कार्य-क्षेत्र है...इसलिए फ्रीलांस डॉक्युमेंटरी निर्माता उसके प्रमोशन के मीडिया कैम्पेन रन नही कर पाते...अपना ही कैमरा लेकर प्रोजेक्टर का भी ख़ुद ही इन्तेजाम करने वाले डॉक्युमेंटरी मेकर इसीलिए 'जो घर उजारो आपनो , चले हमारे साथ' या 'शौक सरे सामां बाज़ार निकला' बतर्ज़ डॉक्युमेंटरी मेकिंग मेहनत के सात-साथ रिसर्च की भूख की भी डिमांड करता है.

डॉक्युमेंटरी को कॉमर्शियल मीडियम बनना चाहिए या नही इस सवाल से ज्यादा जरुरी है की फिल्म की तरह डॉक्युमेंटरी मेकिंग को भी पाठ्यक्रमों का हिस्सा होना चाइये...उस तरह से नही जिसमें फिल्म बनने की पहली ट्रेनिंग डॉक्युमेंटरी निर्माण से ही होती है॥बल्कि उस तरह से जिसमें उस पर स्वायत्त तरीके से बहस की जा सके...उसके भूत-वर्तमान-भविष्य का ग्राफ -मानचित्र तैयार किया जा सके..कई फिल्मकार भी पहले डॉक्युमेंटरी मेकर ही होते हैं और साइड बिज़नस के तौर पर डॉक्युमेंटरी भी समांतर रूप बनाते हैं। विज्ञापन > डॉक्युमेंटरी > फिल्म को चंद सेकंड से कुछ घंटो की कैनवस पर देखें और नाट्यकर्मी > फिल्माभिनेता और प्रिंट पत्रकार > टीवी पत्रकार मीडिया के हाइरार्की के साथ व्यावसायिक पदोन्नति के भी पड़ाव बन जाते हैं.

निसंदेह 'स्माइल पिंकी' को ऑस्कर मिलना डॉक्युमेंटरी के रेगिस्तान में एक मरुद्यान की भांति है..अगर इससे डॉक्युमेंटरी विधा को केवल फ़िल्म समारोहों से बाहर भी गंभीर जन अभिरुचि पैदा होती है..तो इस लिहाज़ से ऑस्कर संजीवनी बूटी है। पोस्ट लिखे जाने तक 'स्लमडाग मिलेनियर' को आठ ऑस्कर मिल चुके थे.

Thursday, February 19, 2009

प्रोमो पर सेंसर की कैंची

ना आना इस देस लाडो का नया प्रोमो टीवी पर चल रहा है. पुराने प्रोमों पर सरकारी और गैर- सरकारी आपत्ति के चलते उसे हटाकर नए प्रोमो को लाया गया । इसमें कोई दो राय नहीं की पुराना प्रोमो ज्यादा असरदार था या कहें की झकझोर कर रख देने वाला था...पर सवाल यह उठता है की क्या गैर -सरकारी आपत्तियां उन लोगों द्वारा दर्ज की गई थी जो यह मानते हैं की कन्या भ्रूण हत्या की घटनाएं ग्रामीण रुढियों की उपज हैं या फिर उन ऊँचें तबकों से आवाजें जो यह कहते है कि आज की सोसाइटी में ऐसी असमानताएं घट रही हैं....कलर्स का फोकस देहाती पृष्ठभूमियों की रुढियों पर है...पर अगर इसी को शहरों के नर्सिंग होम में प्री-नेटल चेक अप के नाम होने वाली कन्या भ्रूण हत्या को शूट किया जाता तो भी क्या ऐतराज जाहिर नही होता...पर यहाँ पर एक चेतावनी यह साफ़ हो गई है कि आगे से टीवी सीरियल के निर्माताओं को भी फिल्मों की तरह सेंसरशिप से गुज़रना पड़ सकता है।

विज्ञापनों से भी अभी सख्ती से पेश आना प्रदर्शित भी है....शीतल पेयों और शराब बियर के विज्ञापन में जिस तरह से ऐडवेंचर फिल्माएं जातें है..मोटर साइकिल के करतब नुमा स्टाइल को जितनी स्पोर्टी स्प्रिट के साथ पेश किया जाता है...हैल्थ ड्रिंक्स से महामानव बनने के जो दावे पेश किए जाते हैं...उनकी तफ्तीश अभी तक प्रसारण मंत्रालय ने नहीं की है..और अगर कोई डिस्क्लेमर या सूचना प्रदर्शित भी होती है तो वो इतने कम समय के लिए होती है कि उसे पूरा पढ़ पाना अक्सर असम्भव होता है...तिस पर जो ५-७ साल के छोटे बच्चे विज्ञापन देखते है..क्या उनकी लिखित भाषा की नींव इतनी मज़बूत हो चुकी होती है...कि वो उस वैधानिक चेतावनी को पढ़ पाएं...आमतौर पर छोटे बच्चों के साथ बड़े लोग भी विज्ञापन को उसके टेक्स्ट के बजाय ऑडियो-विडियो से ही रिकाल करते है....इसीलिए बालिका वधु सीरियल के क्रेडिट रोल से पहले दिखाए जाने वाले राष्ट्रीय सर्वे के नतीजों को कोई इतनी तीव्रता से ग्रहण नही कर सकता जितना कि कार्यक्रम के अंत में लिखित और वाचित पंक्तियों पर सहज रूप से ध्यान जाता है।


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Govt wants foeticide show promo taken off air
The Women and Child Development Ministry on Tuesday asked TV channel Colors to withdraw the promo of its new serial Na Aana Iss Des Lado. The promo shows a group of men drowning a new born girl in a vessel and a man shouting “next year, give me a son”.
The ministry termed the promo derogatory towards the girl child, and stated that it tends to support the belief that the sacrifice of a newborn girl may result in the birth of a boy.


Stating that the intention behind the serial may be to create awareness about ‘socially relevant’ issues, joint secretary in the ministry Kiran Chadda, in her letter to the channel, said the pre-launch campaign appears to glorify the rampant practice of killing girls.



India has only 927 girls below 6 years of age for every 1,000 boys with states like Delhi, Punjab, Haryana, Rajasthan and Gujarat having a sex ratio much below the national average.

Colors said it would address the issues raised as and when it receives the notice. Lado deals with female foeticide, rampant the northern and central India.



“The promotion campaign on Colors shows a negative aspect of our society but fails to alert people against such practices,” a ministry official, who was not willing to be quoted, said.

The letter, a copy of which has been sent to the I&B Ministry, also asks channels to be careful while portraying sensitive issues like foeticide. It is the result of protests by several women and child organisations. “Everytime the promo is shown on TV, I have to change the channel... It is devastating,” said Jalal P. Jha, a blogger on wordpress.com.



Chetan Chauhan, Hindustan Times,November 4, 2006