
बाबा साहेब जयंती के अवसर पर सफर (सोशल एक्शन फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च ) वार्षिक सांस्कतिक 'अभिव्यक्ति २००९' आयोजित कर रहा है। आप सभी सदर आमंत्रित हैं। अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें।
राकेश कुमार सिंह , मो० 9811972872
सूरज ने अंगड़ाई ली / पहली किरण ने / अधखुली घुटी-घुटी आँखों / से काँच बगीचे का निरीक्षण किया...... चकाचौंध से चुंधिया कर उनींदी -उनींदी सी वह/ फिर सूरज में सिमट गई / दिन भर दुबकी रही....... एक म्यान में दो तलवारें कैसे रहतीं ? - सुधा ओम ढींगरा
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२-६ मार्च समय और बेहतरीन मौसम का साथ सोने पर सुहागा साबित हुआ क्योंकि यह आमतौर पर स्कूलों में परीक्षा का समय होता है जिसकी वज़ह से यात्रियों की संख्या गर्मियों की अपेक्षा आधी ही रह जाती है . ग्रीष्मावकाश के समय रोजाना लगभग १ लाख यात्री वैष्णो देवी के दर्शन करते है...साथ ही सर्दी-गर्मी के मिले-जुले माहौल में पहाडों पर पदयात्रा करने का अपना ही लुत्फ़ है..jpg)
रात को १ घंटे बाद ही मेरी नीद उचट गयी थी...और में बिस्तर पर बैठ गयी....कमरे की खिड़की के चारो परदे पूरी तरह मिल नहीं पाए थे...इसलिए उनके बीच शीशे से पार सामने आदि कुमारी की की तरफ वाला पहाड़ की ओर देखकर वक़्त बिताने की कोशिश करने लगी...औरों की नींद ख़राब न हो इसका भी बराबर ख्याल रखना चाहा ...समय का अंदाजा लगाने के लिए चिडियों की चहचाहट की ओर कान लगे थे....क्योंकि अमूमन ५ बजे के बाद उनका प्रात कलरव की स्वरलहरियां गूंजती है। ऐसे वक़्त में उर्दू का एक शेर 'तुम आये हो न शबे इन्तेज़ार गुजरी है, तलाश में है सहर बार-बार गुजरी है ' बरबस याद आ गया. बीच में मम्मी ने करवट बदलते हुए मुझे देखा...मैंने पूछा क्या में नहाने चली जाऊं...फिर सबसे पहले मैंने ही स्नान किया...तब तक ६ बज चुके थे....महेंद्र भैया ने रात को सबको अगले दिन जल्दी उठ कर रेडी रहने की हिदायत दी थी क्योंकि शिवखोरी के लिए निकलना था...फिर ७ बजे तक भैया तैयार होकर एक १२ सीटर बस बुक करने के लिए चले गए....९:३० बजे गाडी होटल के आगे खड़ी थी..jpg)
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कुछ दिन पहले 'मुझे चाँद चाहिए' सुरेन्द्र वर्मा का नायिका प्रधान प्रख्यात हिंदी उपन्यास पड़ते हुए दो हिंदी फिल्में 'फैशन' और 'मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूँ' अनायास याद आ गयी....एक मीडिया कर्मी के लिए तो फिल्में टेक्स्ट होती हैं...पर एक साहित्य के अध्येता के लिए भी फिल्में कितने कारगर तरीके से जीनियोलोगी बनाती चलती है, को जानना दिलचस्प होता है....नायिका वर्षा वशिष्ठ भी 'मेघना माथुर' और 'मोहिनी' उर्फ़ चुटकी की तरह करियर के लिए महत्वकांशी तो है, पर छोटे शहर की लड़कियों का मुंबई को कर्मक्षेत्र बनाने तक का सफ़र में ग्लैमर - सिनेमा और फैशन के प्रति उसका दृष्टिकोण स्ट्रेटेजिक डिसीजन्स के चलते अलग होता है.
सबकी लाडली बेबो (स्टार प्लस) , मेरे घर आई एक नन्ही परी (कलर्स), दोनों ही धारावाहिक ऐसे परिवारों को दिखाते हैं जिनमे कई पीदियों से कोई लड़की पैदा नहीं हुई। आमतौर पर यह देखा गया है की एक बेटी होने के बाद दूसरी बेटी की चाहत नहीं होती....पर बेटों की चाहत बरक़रार रहती है....बेटा पाने की आस में कन्या भ्रूण की हत्या तो होती ही है, फॅमिली प्लानिंग के साइड इफेक्टस भी लड़कियों के हिस्से में ही आये। जिन्दा रही तो घर-बाहर दोनों ही मोर्चों पर गैर-बराबरी का सलूक आम है। चीन में जनसंख्या वृद्धि दर सिफर करने के लिए बनाये गए नियमों के चलते एक संतान के रूप में भी माता पिता बेटे की ख्वाहिश पाले हुए हैं.....हालाँकि बेटे के प्रति प्यार का मतलब हमेशा ही कन्या के प्रति बेरुखी का रूप नहीं होता. ऐसे भी कई परिवार है जो दोनों ही लिंगो की संताने चाहते हैं...पर आज का मौजूं यह है कि क्या कन्या के जन्म को प्रोत्साहन देने के सरकारी गैर सरकारी , सामाजिक सांस्कृतिक मंच उसे केवल प्रकृति में मानव जाति के यौन अनुपात के संतुलन के लिए बढावा दे रहे है, या 'लड़किया कम होगी तो दुल्हन कहाँ से लाओगे ' मार्का जनहित में जारी विज्ञापन की भांति के बहन, बेटी, बहु , पत्नी के पारिवारिक किरदारों की जरुरत पूरी करने के तौर पर देखी जा रही है....या फिर बेटो की अधिकता से होने वाली एकरूपता में परिवार में विविधता लाने के लिए उसकी उपस्थिति होनी चाहिए .....एक मानुषी के रूप में उसकी जरुरत कब महसूस होगी? कब उसे मानवी के नाते जीने का अधिकार मिलेगा...इन सवालों के जवाब बाकी है !.gif)
४ साल के अथक परिश्रम से निर्मित इस फिल्म में भारत के ८ राज्यों और चार धर्मों में जाति प्रथा की भयावह स्थिति को करीब से सेलुलोइड पर उतारा है....५००० साल से चली आ रही वर्ण व्यवस्था के शास्त्र सम्मत होने के दस्तावेजी आख्यान के बाईट्स और उससे दलितों के ऊपर लगाये हुए प्रतिबंधो के समान्तर सिक्वेंस का फ्रिक्शन जबरदस्त बन पड़ा है। शिक्षा से पैदा होने वाली जागरूकता ने भी दलितों के दर्द को कुछ कम नहीं किया है क्योंकि स्कूलों में भी सवर्ण बच्चे अग्रिम पंक्ति में बैठाये जाते हैं और दलित छात्र बेक बेन्चर्स ही बने रहते हैं...उनसे झाडू लगाने को कहा जाता है...यहाँ तक की एक स्कूल में दलित छात्रों को शौचालय साफ़ करने के लिए मजबूर किया जाता रहा है...ताकि वो अपने पुश्तैनी काम से ही बंधे रह सके। इसकी पुष्टि जेएनयू के छात्रावास में होने वाले कमरों के पार्टीशन के इकबालिया बयानों में होती है ...सफदरजंग के दलित शल्य चिकित्सक को भी महत्वपूर्ण केसों का इंचार्ज नहीं बनाया जाता ...वज़ह साफ़ है ... दलित होने के कारण उनकी योग्यता पर शक किया जाता है।
फिल्म में दिखाया गया है की किस तरह से वे सार्वजनिक वाहनों की सवारियों से वंचित है...वो अगडी जाति के गावों में साइकिल पर सवारी नहीं कर सकते, चप्पले पहनकर प्रवेश नहीं कर सकते। एक दलित मिस्त्री जो सवर्णों के मकानों को बनता है...मकान बनाने के बाद उसमें उसका प्रवेश वर्जित हो जाता है । रेल की पटरी के नीचे आकर मरने वालों की लाशों और मृत पशुओं को ठिकाने लगाने वाले लोग हों या सवर्णों स्त्रियों की प्रसूति में मदद करने वाली दलित दाइयां , इनकी भी हालत कोई बेहतर नहीं है। राजपूत जाति के लोग ताल ठोंककर कहते हैं कि नीची जाति के लोग उनके सामने ऊपर बैठने की हिमाकत नहीं कर सकते।
दलितों ने जाति प्रथा के दुष्परिणामों से बचने के लिए धर्मान्तरण का सहारा लिया , पर वहां भी उन्हें चैन नहीं मिलता...इसाई, इसलाम में भी उन्हें दोयम दर्जा दिया जाता रहा है। कैसी विडम्बना है सिख धर्म के स्थापना के समय पंज प्यारों से उनकी जाति नहीं पूछी गयी पर जाट सिख, वाल्मीकि सिख जैसे जाति विभेद बरक़रार हैं...इसलाम में भी जाति का निषेध है...मस्जिद में यह याद रखा जाता है...पर उससे बाहर आते ही लोग जाति भेद को का बर्ताव करने लग जाते हैं...यही हाल नमाज में नमाजियों की पंक्तियों का भी है...इसीलिए शेख-सैयदों की मस्जिदे भी अलग-अलग हो जाती हैं।
दलित और सवर्णों के अंतरजातीय विवाहों की बात तो दूर की कौडी है...खुद दलितों में भी जाति व्यवस्था की हाइरार्की बनी हुई है...अगडे दलित भी अपने से जाति में कमतर दलितों से सामाजिक सम्बन्ध रखने पर सहमत नही हैं.....आरक्षण के पक्ष-विपक्ष में लोगो की राय दिखाकर निर्देशक ने इस सवाल का जवाब दर्शकों पर छोड़ा है। वृत्तचित्र के एक खंड में अखबारों के वैवाहिक विज्ञापन भी जाति-प्रथा की गहराती जड़ों को दिखाते हैं...जिनमें नगरीय भारत विभाजित है। क्लाइमेक्स फ़िल्म का सबसे बेहतरीन हिस्सा है जिसमें निर्देशक ने पत्रकारों के मानिंद केवल अपनी रिपोर्ट पेश नहीं की है ...बल्कि जाति बंधन के प्रतिबन्ध को तोड़ने की एक पहल के जरिये अँधेरे में लौ दिखाई ...इसीलिए 'आपको कैसा लग रहा है ' के टीवी पत्रकारिता की सीमाओं से एक कदम आगे दलित लड़की को सवर्णों के कुएं से पानी भरकर अपना सर गर्व से ऊँचा करते हुए दिखाया है और एक दलित लड़के का सवर्णों के पेयजल को पीना आत्म-सम्मान की तृष्णा के तुष्टि भाव को चित्रित करता है।
चूँकि डॉक्युमेंटरी ऐसे ज्वलंत पर आधारित थी..जिससे किसी न किसी रूप में हर हिन्दुस्तानी का सरोकार बनता है...चाहे वह किसी भी जाति से ताल्लुक रखता हो...इसलिए चर्चा के दौरान गरमा-गर्मी तो हुई ही ....कई लोग भावुक हो कर रो भी दिए....बहरहाल वृतचित्र की खासियत यही थी की इसके कोलाज की भांति विसुअल्स एंड साउंड बाइट्स किसी के दिलो-दिमाग को उद्देलित करने के लिए काफी थे...और दूर तक मन में कई सवालों की अंतहीन कड़ियों को जोड़ते चले जाते हैं.