Monday, February 9, 2009

जिन सी आई ई स्कूल नही वेख्या

कॉलेज में आकर बसंत से कोई खास जुडाव तो महसूस नही होता सिवाय इसके की डेल्ही यूनिवर्सिटी के पार्कों में खिलते हुए फूलों से रौनके बहार आ जाती है..किसी संत ने कहा था इन्सान हमेशा असंतुष्ट रहता है...गर्मी होती है तो कुम्हला जाता है...मौसम को कोसता है...सर्दी होती है तो अकड़ जाता है...ज्यादा सर्दी को रोता है..इस पर नसीरूदीन का जवाब होता है...बसंत से जिसे परेशानी हो वो बताये...तो बसंत का मिजाज़ मध्यमार्गी होता है. स्कूल में बसंत का मतलब होता था फ्लावर शो में भागीदारी , सहभोज की तैयारियां , खेल दिवस और वार्षिक परीक्षा की करीबी का अहसास जो डर से ज्यादा खुशी देता था क्योंकि उसके बाद भी उत्सव चलता रहता था.. एक्साम के बाद वार्षिकोत्सव की तैय्यारी जो होनी थी.


डिपार्टमेंट ऑफ़ एजूकेशन के विद्यालय सी आई ई एक्सपेरिमेंटल बेसिक स्कूल में मिडल क्लास तक शिक्षा ग्रहण की। डेल्ही यूनिवर्सिटी हर साल फूल वालों की सैर की मौके पर फ्लावर शो आयोजित करती है जिसमें स्कूलों की तरफ से क्राफ्ट्स का प्रदर्शन भी किया जाता था...हमारे टीचर्स बच्चों से चीजे बनवा कर या ख़ुद बनाकर छात्रों की नाम के प्रविष्टियाँ भेज देते थे। उसमें इनाम भी मिलता था। सहभोज स्कूल में मनाया जाने वाला वार्षिक प्रीतिभोज था जिसमें बड़ी कक्षाओं के छात्र और अध्यापक मिलकर भोजन बनते थे और बाद में सब लोग मिलकर पंगत में बैठकर उसका आनंद लिया करते थे.उसकी तैयारी भी एक दो दिन पहले से शुरू हो जाती थी.मिटटी में गहरे गड्डे चूल्हे बनने के लिए खोदे जाते थे.बच्चों से घर से चाकू- चकला बेलन मंगाया जाता था .किसी क्लास को भंडारघर में तब्दील कर देते थे तो किसी में पुरियां बेलने के लिए आटे के बोरों से लेकर पराते जमा की जाते थी. किसी कक्षा में आलू छीलने से लेकर मसाले के लिए टमाटर, प्याजों की कटाई का काम किया जाता था...आलू की सब्जी, मिक्स वेज और पुरी के बाद डेज़र्ट में हलवा बतौर प्रसाद बांटा जाता था। लोग अपने बर्तन ख़ुद ही धोते थे ...बड़े बर्तनों को रगड़ने की जिम्मेदारी से लेकर पानी भरने काम बड़े लड़कों को दिया जाता था .



स्कूल के सहभोज के बाद अगला भोज का निमंत्रण सी आई ई महाविद्यालय के ओर से आता था...बी एल एड, बी एड के छात्र-शिक्षकों द्वारा आयोजित इस लंगर का सभी को इंतज़ार रहता था...लंगर की खीर प्रीतिभोज की स्पेशल डिश होती थी। इसके कुछ दिन बाद स्पोर्ट्स डे मनाया जाता था...जिसमें पद सञ्चालन के लिए रोज़ सुबह प्राथना में जीरो पिरिओद में कदमताल का अभ्यास कराया जाता था. स्कूल में छात्रों का दलगत विभाजन होता था। इन दलों के अपने छात्र एवम शिक्षक प्रतिनिधि होते थे॥और बेस्ट दल को भी अवार्ड के तौर पर शील्ड मिलती थी। स्पोर्ट्स डे की विभिन्न प्रतियोगिताएं और सालाना परीक्षाओं के साथ-साथ विभिन्न सांकृतिक गतिविधियों के विजेताओं को वार्षिकोत्सव में पुरस्कृत किया जाता था...आमतौर पर पन्द्रह मार्च तक परीक्षाएं खत्म हो जाती थी और ३१ मार्च को वार्षिकोत्सव मनाया जाता था. इसलिए बीच के पन्द्रह दिनों में स्कूल बिना शैक्षिक उद्देश्य के सालाना जलसे में प्रस्तुत किए जाने वाले कार्यक्रमों के रियाज़ के लिए जाते थे...कुल मिलाकर बसंत के मानी का मतलब सामूहिक सृजन का उत्सव बनता है।

5 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

अच्छा लगा.

विजय तिवारी " किसलय " said...

भावना जी,
जिन सी आई ई स्कूल नहीं देख्या पर लिखा गया रोचक आलेख वाकई बसंत में सृजन का उत्सव प्रतीत हुआ, आपके यहाँ.
-विजय

विनीत कुमार said...

बसंत को कभी इस तरह से महसूस तो नहीं किया. लेकिन पिछले सात-आठ सालों से शहर भर में पीले बैनर लगा देखता हूं जिसके उपर लिखा होता है- सेल। इनमें से किसी एक बैनर के नीचे से झुककर जाता हूं, शो रुम के पुराने पड़ चुके रंगों में बसंत का नया रंग खोजने।

Girindra Nath Jha/ गिरीन्द्र नाथ झा said...

विनीत भाई क्या आप इसे बसंत नही मानते हैं ?

Akanksha Yadav said...

इतने उम्दा लेख के लिए आपको बधाई.